सिद्धार्थ नगर संवाददाता
सिद्धार्थ नगर : 22 / मई / 2026 : पूर्वांचल आज जलवायु परिवर्तन और बढ़ती आबादी की दोहरी चुनौती से जूझ रहा है। एक ओर बाढ़ और दूसरी ओर भीषण गर्मी ने पारंपरिक आवासीय ढांचे की सीमाओं को उजागर कर दिया है। ऐसे समय में अब आवश्यकता केवल मकान बनाने की नहीं, बल्कि ऐसे टिकाऊ और ऊर्जा-संरक्षक घरों की है जो भविष्य की चुनौतियों का सामना कर सकें।
एसोसिएट मेंबर (IEI, कोलकाता) एवं जूनियर इंजीनियर (R.E.D.) प्रियंका जायसवाल ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि किफायती आवास की परिभाषा अब केवल कम लागत तक सीमित नहीं रह सकती। इसमें सस्टेनेबिलिटी, ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन को भी शामिल करना होगा।

उन्होंने बताया कि भवनों को इस प्रकार डिजाइन किया जाना चाहिए जिससे प्राकृतिक रोशनी और वेंटिलेशन अधिकतम हो सके। ‘रिफ्लेक्टिव रूफिंग’ और उच्च तापीय द्रव्यमान वाली सामग्री का प्रयोग बिजली की खपत को लगभग 30 प्रतिशत तक कम कर सकता है। इससे न केवल आम लोगों को राहत मिलेगी बल्कि कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आएगी।
निर्माण क्षेत्र में फ्लाई-ऐश ब्रिक्स और AAC ब्लॉक्स जैसी आधुनिक सामग्री को अपनाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि इससे खेतों की उपजाऊ मिट्टी का संरक्षण होगा और भवनों में बेहतर थर्मल इन्सुलेशन मिलेगा। वहीं बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में ‘स्टिल्ट’ और ‘एम्फीबियस डिजाइन’ जैसी तकनीकों को अपनाना समय की आवश्यकता है।
प्रियंका जायसवाल ने कहा कि ‘माईवन’ और प्री-कास्ट कंक्रीट जैसी तकनीकें निर्माण कार्य को तेज और अधिक टिकाऊ बनाती हैं। साथ ही IS 456:2000 और IS 1893 जैसे मानकों का पालन जन सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।
उन्होंने रेन वॉटर हार्वेस्टिंग और सोलर पैनलों को हर घर का अनिवार्य हिस्सा बनाने की वकालत करते हुए कहा कि इंजीनियरिंग और पर्यावरणीय संवेदनशीलता के संतुलन से ही आत्मनिर्भर और सुरक्षित पूर्वांचल की नींव रखी जा सकती है।
प्रियंका जायसवाल का मानना है कि यदि आधुनिक तकनीक, गुणवत्ता और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए तो पूर्वांचल आने वाले समय में पूरे प्रदेश के लिए ‘नेट-जीरो’ और रेजीलियंट हाउसिंग का मॉडल बन सकता है।
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