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जजिया कर बना आमजन पर भारी, विदेशी यात्री ने दर्ज किए मुगलकाल के हालात

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19 / मई / 2026 :  मुगलकाल में लगाए गए जजिया कर को लेकर इतिहास में कई उल्लेख मिलते हैं। 17वीं शताब्दी में भारत आए इतालवी यात्री एवं लेखक निकोलाओ मानुची ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Storia do Mogor में तत्कालीन शासन व्यवस्था, दरबार और कर प्रणाली का विस्तार से वर्णन किया है। मानुची शाहजहाँ और औरंगज़ेब के दौर में भारत में रहे तथा दारा शिकोह की सेना में भी कार्य कर चुके थे।

मानुची के विवरण के अनुसार, जजिया कर का बोझ सामान्य हिन्दू प्रजा पर अत्यधिक भारी पड़ता था। उन्होंने लिखा कि एक साधारण मजदूर को अपनी लगभग दो महीने की कमाई जजिया के रूप में देनी पड़ती थी, जबकि तीर्थयात्रा करने वालों पर अतिरिक्त कर लगाया जाता था। कई अवसरों पर यह राशि कई महीनों की आय के बराबर बताई गई है।

इतिहासकारों के अनुसार, जजिया एक धार्मिक कर था जिसे गैर-मुस्लिम प्रजा से वसूला जाता था। औरंगज़ेब के शासनकाल में इसे पुनः लागू किए जाने के बाद समाज में व्यापक असंतोष की स्थिति उत्पन्न हुई थी। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में यह भी उल्लेख मिलता है कि आर्थिक दबाव के कारण आम लोगों को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था।

हालांकि इतिहास के इन विवरणों को अलग-अलग इतिहासकारों ने विभिन्न दृष्टिकोणों से प्रस्तुत किया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी ऐतिहासिक घटना को समझने के लिए अनेक स्रोतों और तथ्यों का अध्ययन आवश्यक होता है।

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Author: krjnews

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