
, दिनेश चंद्र गुप्ता कांटे वालो की कलम से लिखा गया लेख वीर शिरोमणि हिन्दू हृदय सम्राट महाराणा प्रताप जी (ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत 1597 तदनुसार 9 मई 1540 19 जनवरी 1597) उदयपुर, मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता, शौर्य, त्याग, पराक्रम और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने मुगल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और कई सालों तक संघर्ष किया, अंततः अकबर महाराणा प्रताप को अधीन करने में असफल रहा। महाराणा प्रताप की नीतियां शिवाजी महाराज से लेकर ब्रिटिश के खिलाफ बंगाल के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनीं।
महाराणा के निधन उपरंत अकबर के शब्दों का हिंदी अनुवाद।
हे गेहलोत राणा प्रताप सिंह तेरी मृत्यु पर शाह यानि सम्राट ने दाँतों के बीच जीभ दबाई और विश्वास के साथ आँसू टपकाए। क्योंकि तूने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया। तूने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालाँकि तू अपना आडा यानि यश या राज्य तो गवाँ गया लेकिन फिर भी तू अपने राज्य के धुरे को बाएँ कन्धे से ही चलाता रहा। तेरी रानियाँ कभी नवरोजों में नहीं गई और ना ही तू खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गया। तू कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहा और तेरा रौब दुनिया पर निरन्तर बना रहा। इसलिए मैं कहता हूँ कि तू सब तरह से जीत गया और बादशाह हार गया इसके मे महाराणा प्रताप प्रतिमा निर्माण समिति के विजय सोलंकी , शिवराम सिंह , विनय प्रताप सींग , सतीश सोलंकी , सुरेन्द्र राघव , अजय छोकर आदि लोग थे। कार्यक्रम का शुभआरम्भ हवन से हुआ जिसमे डॉ चंद्रमोहन सिंह प्रदेश मंत्री भाजपा रहे ! साथ ही इसमे विधायक मीनाक्षी सिंह तथा पूर्व विधायक हरपाल सिंह समेत सेकड़ो लोग उपस्थित रहे।
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Author: krjnews
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