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गोरखपुर में वार्ड 43 शाहपुर की पार्षद ज्ञानती देवी का निर्वाचन निरस्त, कोर्ट ने चुनाव को घोषित किया शून्य

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सुनील पाठक , गोरखपुर

 

गोरखपुर : 27 / जुलाई / 2026 :  नगर निगम गोरखपुर के वार्ड संख्या 43, शाहपुर की पार्षद ज्ञानती देवी पत्नी स्व. परशुराम का नामांकन और निर्वाचन एडीजे फास्ट ट्रैक कोर्ट (महिलाओं के विरुद्ध अपराध) ने निरस्त कर दिया है। गुरुवार, 23 जुलाई को एडीजे सुदेश कुमार की अदालत ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए चुनाव याचिका संख्या 05/2023 को स्वीकार कर लिया।

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम की धारा 71 की उपधारा (b) तथा (d)(i) के तहत निर्वाचन को अवैध और शून्य घोषित किया है। आदेश की प्रति आवश्यक कार्रवाई हेतु जिला निर्वाचन अधिकारी (नगरीय निकाय) को प्रेषित कर दी गई है।

इस मामले में आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी रहीं अर्चना शुक्ला ने ज्ञानती देवी के नामांकन और निर्वाचन को चुनौती दी थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि नामांकन के दौरान शपथ पत्र में कई महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया, जिससे चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हुई। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों और प्रस्तुत साक्ष्यों पर विचार करने के बाद याचिका को सही मानते हुए यह निर्णय दिया।

जिला निर्वाचन अधिकारी एवं जिलाधिकारी दीपक मीणा ने बताया कि उन्हें अभी आदेश की प्रति का विस्तृत अवलोकन करना है। उन्होंने कहा कि कोर्ट के आदेश के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। इस फैसले के बाद नगर निगम क्षेत्र में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।
दरअसल, वर्ष 2023 के नगरीय निकाय चुनाव में वार्ड संख्या 43 महिला के लिए आरक्षित था। पूर्व उपसभापति चन्द्रशेखर सिंह ने अपनी माता ज्ञानती देवी को भाजपा प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतारा था। उन्हें भाजपा का अधिकृत टिकट मिलने का दावा किया गया था और उन्होंने चुनाव में 1723 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी।

हालांकि, विपक्षी प्रत्याशी अर्चना शुक्ला ने चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद जिला जज के समक्ष चुनाव याचिका दायर की। बाद में यह वाद एडीजे फास्ट ट्रैक कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां इसकी सुनवाई हुई। याचिका में प्रमुख आरोप यह था कि ज्ञानती देवी को भाजपा का आधिकारिक सिंबल नहीं मिला था। सिंबल किसी अन्य “ज्ञानती देवी पत्नी श्यामलाल” के नाम से जारी हुआ था, जबकि नामांकन “ज्ञानती देवी पत्नी परशुराम” के नाम से दाखिल किया गया।

सुनवाई के दौरान तत्कालीन भाजपा महानगर अध्यक्ष राजेश गुप्ता का शपथ पत्र भी प्रस्तुत किया गया। इसमें उन्होंने कहा कि ज्ञानती देवी ही पार्टी की अधिकृत प्रत्याशी थीं और उनके अलावा कोई अन्य उम्मीदवार नहीं था। हालांकि, पति के नाम में अंतर को लेकर स्पष्ट और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए जा सके। बाद में राजेश गुप्ता की ओर से यह भी कहा गया कि उन्हें चुनाव के लगभग एक महीने बाद यह जानकारी मिली कि ज्ञानती देवी के पति का नाम परशुराम उर्फ श्यामलाल है।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि ज्ञानती देवी ने अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां भी छुपाईं। आरोप के अनुसार, उनके नाम पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास आवंटित था, जिसकी जानकारी शपथ पत्र में नहीं दी गई। इसके अतिरिक्त, उनके नाम से 3 हजार वर्ग फीट से अधिक की जमीन की खरीद की जानकारी भी छुपाई गई। याचिका में यह भी कहा गया कि देवरिया जिले के बरहज स्थित गांव में वर्ष 2021 में उन्होंने ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ा था और वहां की मतदाता सूची में उनका नाम दर्ज था, जिसे भी नामांकन के समय उजागर नहीं किया गया।

इन सभी बिंदुओं पर विचार करते हुए कोर्ट ने पाया कि शपथ पत्र में तथ्यों का समुचित खुलासा नहीं किया गया, जो चुनावी नियमों का उल्लंघन है। इसी आधार पर कोर्ट ने निर्वाचन को शून्य घोषित करने का आदेश दिया।

वहीं, ज्ञानती देवी के पुत्र राघवेंद्र सिंह ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह मात्र शब्दों की त्रुटि का मामला है और विपक्ष ने जानबूझकर इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है। उन्होंने दावा किया कि चुनाव पूरी पारदर्शिता के साथ लड़ा गया और किसी प्रकार की धांधली नहीं हुई। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी माता ने भारी मतों से जीत दर्ज की थी, जो जनता के समर्थन को दर्शाता है।

दूसरी ओर, याची अर्चना शुक्ला ने कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि उन्होंने नामांकन के समय से ही अनियमितताओं की शिकायत की थी। उन्होंने बताया कि रिटर्निंग ऑफिसर को भी सभी साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे, लेकिन वहां सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद न्याय पाने के लिए उन्हें अदालत का सहारा लेना पड़ा।

इस फैसले के बाद अब वार्ड संख्या 43 में आगे की चुनावी प्रक्रिया को लेकर स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार है। जिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा कोर्ट के आदेश का अध्ययन करने के बाद ही आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।

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Author: krjnews

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