शिकारपुर : 5 / अक्टूबर / 2026 : कभी घरों की मुंडेर पर बैठकर कांव-कांव करने वाले कौए गांव और कस्बों की पहचान हुआ करते थे। कौए की आवाज सुनते ही लोग इसे मेहमान के आने का संकेत मानते थे। फिल्मों और लोकगीतों में भी मुंडेर पर बैठे कौए का जिक्र खूब सुनने को मिलता था।
लेकिन बदलते पर्यावरण और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच अब कौओं की कांव-कांव पहले जैसी सुनाई नहीं देती। स्थिति यह है कि पितृ पक्ष में पूर्वजों को अर्पित किए जाने वाले भोजन का पहला ग्रास खिलाने के लिए भी कौए आसानी से नहीं मिल रहे हैं।

हिंदू धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं में कौए को पितरों का प्रतीक माना जाता है। पितृ पक्ष के दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए कौए को भोजन का पहला ग्रास खिलाने की परंपरा है। पंडित मनीष शर्मा के अनुसार कौए को पितरों का प्रतीक माना जाता है। कौआ उपलब्ध न होने की स्थिति में कई लोग परंपरा के अनुसार पहला ग्रास गाय को अर्पित करते हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञों और जानकारों के मुताबिक लगातार बढ़ता शहरीकरण, पेड़ों की घटती संख्या और बढ़ता प्रदूषण पक्षियों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर रहा है।
पेड़ों की संख्या कम होने के साथ ही पक्षियों के लिए भोजन, घोंसले और सुरक्षित स्थान भी घटते जा रहे हैं। पर्यावरण में लगातार हो रहे बदलाव का असर कौओं समेत कई अन्य पक्षियों की संख्या पर भी दिखाई दे रहा है।
कभी गांवों की गलियों, खेतों और घरों की मुंडेरों पर बड़ी संख्या में नजर आने वाले कौए अब गिने-चुने दिखाई देते हैं। गौरव मित्तल का कहना है कि कौओं की घटती संख्या पर्यावरण में हो रहे बदलाव का संकेत है। इनके प्राकृतिक आवास को बचाने और पेड़-पौधों की संख्या बढ़ाने की दिशा में समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाने की जरूरत है।
यदि ऐसा नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों के लिए कौए भी केवल कहानियों, तस्वीरों और किताबों में दिखाई देने वाले पक्षी बनकर रह सकते हैं।
![]()
Author: krjnews
KRJ News एक विश्वसनीय हिंदी डिजिटल न्यूज़ पोर्टल है, जिसका उद्देश्य पाठकों तक तेज़, निष्पक्ष और तथ्यपरक समाचार पहुँचाना है।










